संविदा द्वारा सृजित संबंधो के सदृश कतिपय संबंधों के विषय में

कभी-कभी कुछ विशेष परिस्थितियों में प्राकृतिक न्याय और साम्या के आधार पर विधि वास्तविक संविदा के समान ही दायित्व किसी व्यक्ति पर अधिरोपित कर देती है, जो की विधिमान्य संविदा नहीं है । अतः संविदा कल्प का वास्तविक और तकनीकि अर्थ से संविदा न होते हुए भी विधि द्वारा संविदा मान लिए जाने से है ।

संविदा का उन्मोचन कब होता है (Redemption of contract)

जब संविदा पक्षकारों पर बंधनकारी नहीं रह जाती तब यह कहा जाता है कि संविदा उन्मुक्त हो गई है । संविदा का उन्मोचन संविदा के पालन द्वारा, करार व नवीनीकरण द्वारा, संविदा भंग द्वारा अथवा पालन की असम्भवता द्वारा हो सकता है ।

समाश्रित संविदा क्या है (What is contingent contract)

“समाश्रित संविदा” की परिभाषा – यह धारा समाश्रित संविदा को परिभाषित करता है जिसके अनुसार समाश्रित संविदा वह संविदा है जो ऐसी संविदा के साम्पार्श्विक किसी घटनाओं के होने या न होने पर किसी बात को करने या न करने के लिए हो ।

शून्य करार क्या है (What is void agreement)

जो करार विधि द्वारा प्रवर्तनीय नही होता है उसे शून्य करार कहते हैं । करार धारा 20 के अंतर्गत पक्षकारो के तथ्य सम्बन्धी भूल के होने पर भी शून्य होता है । धारा 23 के अंतर्गत प्रतिफल या उद्देश्य के विधिविरुद्ध होने पर भी करार शून्य होता है वही धारा 56 के अंतर्गत असंभव कार्य करने का करार शून्य होता है, इत्यादि शून्य करार के उदाहरण हैं ।

विधिपूर्ण उद्देश्य क्या है समझिए?( Explanation of Lawful Object)

यदि किसी करार का प्रतिफल या उद्देश्य भारत में प्रवृत्त किसी विधि के प्रतिकूल है तो ऐसा करार शून्य होगा । उदाहरण के लिए यदि ‘A’, ‘B’ को दस हजार रूपये देने का करार इसलिए करता है कि ‘B’, ‘C’ की हत्या कारित कर दे तो ऐसा करार विधिविरुद्ध होने कारण शून्य होगा ।