धारा 23 यह स्पष्ट करती है कि कौन से प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्ण हैं और कौन से नही । इस धारानुसार करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण है जबकि वह –

1. विधि द्वारा वर्जित न हो,

2. विधि के उपबंधों को निष्फल करने वाला न हो,

3. कपटपूर्ण न हो,

4. किसी शरीर या संपत्ति की क्षति करने हेतु न हो,

5. अनैतिक न हो ।

1. विधि द्वारा वर्जित न हो – यदि किसी करार का प्रतिफल या उद्देश्य भारत में प्रवृत्त किसी विधि के प्रतिकूल है तो ऐसा करार शून्य होगा । उदाहरण के लिए यदि ‘A’, ‘B’ को दस हजार रूपये देने का करार इसलिए करता है कि ‘B’, ‘C’ की हत्या कारित कर दे तो ऐसा करार विधिविरुद्ध होने कारण शून्य होगा ।

2. विधि के उपबंधो को निष्फल करने न वाला हो – यदि करार इस प्रकृति का है कि उसे करने की अनुमति देने पर वह किसी विधि के उपबंध को निष्फल कर देगा, करार शून्य होगा । ‘विधि’ शब्द के अन्तर्गत वे सभी विधियां सम्मिलित है जो भारत में प्रवर्तनीय हैं जिसमें व्यक्तिगत विधि भी शामिल है ।

अब्दुल बनाम हुसैनी बी, 1904 के वाद में विवाह के पूर्व एक मुस्लिम पत्नी और उसके पति के मध्य करार हुआ कि विवाह के उपरान्त भी पत्नी सदा अपने मां-बाप के साथ रहने के लिए स्वतंत्र रहेगी । इस करार को शून्य ठहराया गया ।

3. कपटपूर्ण न हो – यदि किसी करार का उद्देश्य या प्रतिफल कपट करना है तो करार शून्य हो जाएगा ।

मनीराम बनाम पुरुषोत्तम लाल, 1930 के वाद में वादी को यह पता था कि रेलवे कम्पनी उसे ठेका नहीं देगी इसलिए उसने प्रतिवादी से करार किया कि उसके नाम से ठेका मिलने पर वादी ही वास्तविक ठेकेदार के रूप में कार्य करेगा । प्रतिवादी को रेलवे कम्पनी का ठेका मिल गया तत्पश्चात वादी ने प्रतिवादी द्वारा किये गये करार को प्रवर्तित कराने के लिए वाद लाया । न्यायालय ने यह निर्णीत किया कि वादी का उद्देश्य रेलवे कम्पनी से कपट करना था ।       

4. किसी शरीर या संपत्ति की क्षति करने हेतु न हो – यदि किसी करार का उद्देश्य किसी व्यक्ति के शरीर अथवा संपत्ति को क्षति कारित करना हो तो ऐसा करार शून्य होगा ।

रामस्वरूप बनाम वंशी मन्दर, 1915 के वाद में एक व्यक्ति ने एक ऋणदाता से सौ रुपया उधार लिया जिसके लिए उसने एक बन्धपत्र निष्पादित किया जिसमें शर्त यह थी कि वह बिना किसी वेतन के ऋणदाता के लिए दो वर्ष तक कार्य करेगा और ऐसा न करने पर वह अधिक ब्याज के साथ उन सौ रुपयों को तुरंत लौटा देगा । न्यायालय ने यह निर्णीत किया कि ऐसा करार शून्य है क्योंकि यह गुलामी थी और इससे शरीर को क्षति पहुंचती थी ।

5. अनैतिक न हो – अनैतिकता को संविदा अधिनियम में कही परिभाषित नहीं किया गया है । सामान्यतया यदि करार का प्रतिफल या उद्देश्य न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त नैतिकता के सिद्धांत के विरुद्ध होता है तो वह नैतिकता के आधार पर शून्य होगा ।

धारा में संलग्न दृष्टान्त (J) के अनुसार – ‘A’ जो ‘B’ का मुख्तार है, उस असर को जो उस हैसियत में उसका ‘B’ पर है ‘C’ के पक्ष में प्रयुक्त करने का वचन देता है और ‘A’ को 1000 रूपये देने का वचन ‘C’ देता है । करार शून्य है, क्योंकि यह अनैतिक है ।

वेश्यावृत्ति को बढावा देने वाले करार अनैतिक होते है इसलिए यह करार शून्य है । यदि कोई व्यक्ति किसी वेश्या को वेश्यावृत्ति का पेशा करने के लिए ऋण देता है अथवा आभूषण देता है या घोड़ागाड़ी या कार देता है और देने वाले को इस बात की जानकारी है कि इसका प्रयोग वेश्यावृत्ति के निमित्त किया जाएगा तो करार शून्य होगा और करार के अन्तर्गत वास्तव में दिए गये धन, आभूषण, घोड़ागाड़ी या कार वसूल नही कर सकता ।

इसी प्रकार ऐसे करार जो किसी वैवाहिक संबंधो में हस्तक्षेप करता है, अनैतिकता के आधार शून्य ठहराए जाते है । जैसे – यदि कोई व्यक्ति किसी विवाहित महिला को कुछ रूपये इस शर्त पर देता है कि वह अपने पति से तलाक़ ले सके और ऋणदाता से विवाह कर सके, करार अनैतिक होने के कारण शून्य होगा और ऋणदाता वास्तव में दी गई रकम को वसूल नहीं कर सकता है । इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी महिला से यह करार करता है अपनी पत्नी के मर जाने के बाद उस महिला से शादी कर लेगा तो यह करार भी अनैतिकता के आधार पर शून्य है ।

6. लोकनीति के विरुद्ध न हो – लोकनीति की परिभाषा संक्षिप्त या ठीक-ठीक नहीं दी जा सकती इसकी व्याख्या करने का कार्य न्यायालय का है न कि कार्यपालिका का ।

लोकनीति का अर्थ किसी विशेष सरकार के नीति से नहीं है इसके अन्तर्गत लोकहित या लोक भलाई की बातें सम्मिलित है जो समयानुसार बदलती रहती है । लोकहित के सिद्धांत का प्रयोग सावधानी के साथ करना चाहिए इसका प्रयोग वहां नहीं करना चाहिए जहाँ लोकहित को हानि पहुँचने की सम्भावना स्पष्ट हो ।

निम्न कार्यो को लोक नीति के विरुद्ध माना गया है –

a. लोक पद का व्यापार

b. विदेशी शत्रु के साथ व्यापार

c. न्याय के मार्ग में बाधा

d. दाण्डिक अभियोजन में बाधा

e. वाद पोषण और वाद क्रय

धारा 24. यदि प्रतिफल और उद्देश्य भागतः विधिविरुद्ध हो तो करार शून्य होंगे –

यदि प्रतिज्ञा का प्रतिफल भागतः विधिविरुद्ध हो तो उसको प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता मगर दोनों भाग अगर पृथक किये जा सकते है तो प्रतिज्ञा का वह भाग, जिसका प्रतिफल विधिपूर्ण है, प्रवर्तनीय होगा परन्तु प्रतिज्ञा का जो भाग विधिविरुद्ध है, शून्य होगा ।

उदाहरण – प्रतिवादी, वादी को 50 रूपये प्रतिमाह इस बात के लिए देने की प्रतिज्ञा करता है कि वादी उसके साथ जारकर्म का सम्बन्ध रखेगी तथा उसकी गृह संरक्षिका के रूप में रहेगी । यहाँ जारकर्म विधिविरुद्ध तथा गृह संरक्षिका के रूप में रहना विधिपूर्ण था और इस प्रकार विधिविरुद्ध व विधिपूर्ण कार्य को पृथक नहीं किया जा सकता मगर यदि वह 20 रूपये जारकर्म के लिए देता और 30 रूपये गृह संरक्षिका के लिए तो इसे पृथक किया जा सकता था ।

सांपार्श्विक संविदा – अवैध संविदा से सम्बंधित साम्पार्श्विक संविदा भी अवैध होगी परन्तु यदि संविदा शून्य है तो उस साम्पार्श्विक संविदा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

उदाहरण – ‘A’, ‘B’ के मध्य तस्करी करने का करार हुआ इस निमित्त ‘A’, ‘C’ से ऋण लिया । ‘A’, ‘B’ में करार अवैध होने के कारण शून्य है और इसके मध्य उसका साम्पार्श्विक करार जो ‘A’और ‘C’ के मध्य हुआ था, शून्य है ।

‘A’ और ‘B’ के मध्य करार होता है, ‘B’ अवयस्क है ।’A’, ‘B’ को ब्याज पर ऋण देने की प्रतिज्ञा करता है तत्पश्चात ‘A’, ‘C’ से ऋण लेता है ताकि वह ‘B’ को ऋण दे सके । ‘A’ और ‘B’ के मध्य हुआ करार इस कारण शून्य होगा कि ‘B’ अवयस्क है । ‘A’ और ‘C’ के मध्य हुये करार का साम्पार्श्विक करार है परन्तु ‘A’ और ‘C’ के मध्य करार शून्य नहीं हो सकता ।