जब संविदा पक्षकारों पर बंधनकारी नहीं रह जाती तब यह कहा जाता है कि संविदा उन्मुक्त हो गई है । संविदा का उन्मोचन संविदा के पालन द्वारा, करार व नवीनीकरण द्वारा, संविदा भंग द्वारा अथवा पालन की असम्भवता द्वारा हो सकता है ।  

A. संविदा के पालन द्वारा उन्मोचन –

संविदायें जिनका पालन करना होगा (धारा 37 से 39) – धारा 37 यह स्पष्ट करती है कि संविदा के पक्षकारों को अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करना चाहिए या वचन करने की प्रस्थापना करना चाहिए जब तक कि ऐसा पालन इस अधिनियम द्वारा या किसी अन्य विधि के अन्तर्गत अभिमुक्त या अभिक्षम्य न कर दिया गया हो ।

संविदा के पक्षकारों द्वारा की गयी प्रतिज्ञायें उनकी मृत्यु के बाद उनके प्रतिनिधियों पर भी बंधनकारी होती है जब तक कि संविदा से इसके प्रतिकूल आशय न प्रतीत होता हो ।

दृष्टांत –‘A’ 1000 रूपये का संदाय किये जाने पर ‘B’ को अमुक दिन माल परिदत्त करने का वचन देता है । ‘A’ उस दिन से पहले ही मर जाता है । ‘A’ के प्रतिनिधि ‘B’ को माल परिदत्त करने के लिए आबद्ध है और ‘A’ के प्रतिनिधियों को ‘B’ एक हजार रूपये देने के लिए आबद्ध है ।

धारा 38 के अनुसार यदि कोई पक्षकार पालन करने की प्रस्थापना करता है और दूसरा पक्षकार उसे स्वीकार नहीं करता है तो वह संविदा के अपालन के लिए दायी नहीं होगा और न ही संविदा के अधीन अपने अधिकार को इस कारण खोएगा, परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि पालन करने कि प्रस्थापना निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती हो –

1. वह बिना किसी शर्त के होगी ।

2. प्रस्थापना उचित समय और स्थान पर की जायेगी जिससे कि वह जिसे की जाये, उसे यह अभिनिश्चित करने का युक्तियुक्त अवसर मिल जाये कि वह व्यक्ति, जिसके द्वारा वह की गयी है वह समस्त, जिसे करने को वह वचन द्वारा आबद्ध है, वही और उसी समय करने के लिए योग्य और रजामंद होने के लिए है ।  

3. यदि वह प्रस्थापना प्रतिज्ञाग्रहीता को कोई चीज परिदत्त करने के लिए है तो प्रतिज्ञाग्रहीता को यह जानने का युक्तियुक्त अवसर हो कि जो वस्तु प्रस्तुत की गयी है वह वही वस्तु है जिसे परिदत्त करने के लिए प्रतिज्ञाकर्ता अपनी प्रतिज्ञा द्वारा बाध्य है ।

कई संयुक्त वचनग्रहीताओं में से एक से की गयी प्रस्थापना के विधिक परिणाम वे ही है जो उन सब से की गयी प्रस्थापना से ।           

धारा 39 के अनुसार जबकि किसी संविदा के एक पक्षकार ने अपने भाग का पूर्णतः पालन करने से इन्कार कर दिया हो या ऐसा पालन करने के लिए अपने को निर्योग्य बना दिया हो तब वचनग्रहीता संविदा का अंत कर सकेगा, यदि उसने उसे चालू रखने की शब्दों द्वारा या आचरण द्वारा अपनी सहमति संज्ञापित न की हो ।

दृष्टांत – एक गायिका ‘A’ एक नाट्यगृह के प्रबंधक ‘B’ से अगले दो मास के दौरान में प्रति सप्ताह दो रात उसके नाट्यगृह में गाने की संविदा करती है और ‘B’ उसे हर रात गाने के लिए 100 रुपया देने का वचनबन्ध करता है । छठी रात को ‘A’ नाट्यगृह से जानबूझकर अनुपस्थित रहती है । ‘B’ संविदा का अंत करने के लिए स्वतंत्र है ।

दृष्टांत – एक गायिका ‘A’ एक नाट्यगृह के प्रबंधक ‘B’ से अगले दो मास के दौरान में प्रति सप्ताह में दो रात उसके नाट्यगृह में गाने की संविदा करती है और ‘B’ उसे प्रति रात के लिए 100 रूपये की दर से संदाय करने का वचनबन्ध करता है । छठी रात को ‘A’जानबूझकर अनुपस्थित रहती है । ‘B’ की अनुमति से ‘A’ सातवीं रात को गाती है । ‘B’ ने संविदा के जारी रहने के लिए अपनी उपमति संज्ञापित कर दी है और अब वह उसका अंत नहीं कर सकता । किन्तु छठी रात को ‘A’ के न गाने से उठाये गये नुकसान के लिए वह प्रतिकर का हकदार है ।

संविदा का पालन किसे करना होगा (धारा 40 से 45) –

धारा 40. वह व्यक्ति जिसे वचन का पालन करना है – इस धारानुसार यदि मामले की प्रकृति से यह प्रतीत होता है कि किसी संविदा के पक्षकारों का यह आशय था कि उसमे अंतर्विष्ट किसी वचन का पालन स्वयं वचनदाता द्वारा किया जाये तब ऐसी प्रतिज्ञा का पालन स्वयं प्रतिज्ञाकर्ता द्वारा किया जाना चाहिए परन्तु इससे भिन्न दशाओं में प्रतिज्ञाकर्ता या उसका प्रतिनिधि उसके पालन हेतु किसी सक्षम व्यक्ति को नियोजित कर सकता है ।

यदि संविदा का आधार पक्षकार का व्यक्तिगत कौशल है तो उस पक्षकार द्वारा स्वयं संविदा का पालन करना होगा और वह उसका पालन किसी अन्य व्यक्ति से नहीं करा सकता है । उदाहरण के लिए ‘A’, ‘B’ के लिए रंगचित्र बनाने की प्रतिज्ञा करता है । ‘A’ को स्वयं इस प्रतिज्ञा का पालन करना चाहिए ।

धारा 41. अन्य व्यक्ति से पालन प्रतिग्रहीत करने का प्रभाव – इस धारानुसार यदि वचनग्रहीता किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिज्ञा का पालन स्वीकार कर लेता है तो बाद में वह उस प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए प्रतिज्ञाकर्ता से नहीं कह सकता है । इसके लिए आवश्यक है कि उस तीसरे व्यक्ति ने संविदा का पालन पूर्णरूप से किया हो, आंशिक रूप से संविदा का पालन इस निमित्त पर्याप्त नहीं है । ऐसा चन्द्रशेखर हब्बार बनाम वी. भण्डारी के वाद में कहा गया ।

कपूरचन्द गोधा बनाम मीर नवाब हिमायत अली खान आजमशाह, 1963 के वाद में कहा गया कि यदि संविदा का पालन पूर्ण रूप से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है और प्रतिज्ञाग्रहीता उस पालन को स्वीकार कर लेता है तो इसके बाद वह उसका पालन प्रतिज्ञाकर्ता से नहीं करा सकता है ।

यदि बीमा कराने वाला व्यक्ति बीमा करने वाले व्यक्ति से सम्पूर्ण हानि के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त कर लेता है तो इसके बाद वह उस हानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा उन व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं कर सकता जो उक्त हानि के लिए जिम्मेदार हैं ।

धारा 42. संयुक्त दायित्वों का न्यागमन – जब दो या दो से अधिक व्यक्ति संयुक्ततः प्रतिज्ञा करते है तो जब तक कि संविदा में प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो वे सभी व्यक्ति अपने जीवन काल में संयुक रूप से उस प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होंगे । यदि उन प्रतिज्ञाकर्ताओं में से किसी की मृत्यु हो जाती है तो उस मृतक का प्रतिनिधि उत्तरजीवी प्रतिज्ञाकर्ता या प्रतिज्ञाकर्ताओं के साथ संयुक्त रूप से और अंतिम उत्तरजीवी प्रतिज्ञाकर्ता की मृत्यु के बाद सभी मृतक प्रतिज्ञाकर्ताओं के प्रतिनिधि संयुक्त रूप से प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए उत्तरदायी होंगे ।

प्रतिनिधियों का दायित्व वही तक सीमित होगा जहां तक वे मृतक की संपत्ति प्राप्त करते है । 

धारा 43. संयुक्त वचनदाताओं में से कोई भी पालन के लिए विवश किया जा सकेगा – जबकि किसी संविदा में दो या दो अधिक व्यक्ति संयुक्त रूप से प्रतिज्ञाकर्ता हो तब वचनग्रहीता यदि तत्प्रतिकूल अभिव्यक्त करार न हो तो ऐसे संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में किसी एक या एक से अधिक को सम्पूर्ण  प्रतिज्ञा के पालन के लिए विवश कर सकेगा ।

जिस प्रतिज्ञाकर्ता से सम्पूर्ण धन वसूल किया जाता है, वह अन्य प्रतिज्ञाकर्ताओं से आनुपातिक धनराशि वसूल कर सकेगा यदि संविदा से प्रतिकूल आशय न प्रतीत होता हो । जैसे – ‘A’, ‘B’ और ‘C’ संयुक्त रूप से ‘D’ को 3000 रूपये देने की प्रतिज्ञा करते है । ‘C’ सम्पूर्ण राशि देने के लिए मजबूर किया जाता है । अतः वह ‘A’से 1000 रुपया और ‘B’ से 1000 रुपया वसूल कर सकेगा ।

यदि प्रतिज्ञाकर्ताओं में कोई एक अपना हिस्सा देने में चूक करता है तो बाकी संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं को उसके हिस्से का अभिदाय समान रूप से देना पड़ेगा ।

धारा के साथ संलग्न स्पष्टीकरण के अनुसार यह धारा मूल ऋणी की ओर से प्रतिभू द्वारा किये गये भुगतान को अपने मूल ऋणी से वसूल करने से उस प्रतिभू को नहीं रोकेगी ।

दृष्टांत – ‘D’ को 3000 रूपये देने का संयुक्त वचन ‘A’, ‘B’ और ‘C’ ने दिया है । ‘C’ के लिए ‘A’ और ‘B’ प्रतिभू मात्र है । ‘C’ रुपयों के संदाय में असफल रहता है । ‘A’ और ‘B’ पूर्ण राशि देने के लिए विवश किये जाते है । वे उसे ‘C’ से वसूल करने के हकदार है ।

धारा 44. संयुक्त वचनदाताओं में से एक की निर्मुक्ति का प्रभाव – इस धारा के अनुसार जहां दो या दो से अधिक प्रतिज्ञाकर्ता है उनमें से किसी एक को संविदा पालन से छूट देने से अन्य प्रतिज्ञाकर्ताओं को दायित्व से छूट नहीं मिलती । इसके साथ ही जिस प्रतिज्ञाकर्ता को इस प्रकार छूट प्रदान की गयी है, उसको संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं को अंशदान करने के दायित्व से छूट नहीं मिलती है ।

यह उल्लेखनीय है कि आंग्ल विधि के अंतर्गत यदि एक संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ता को संविदा के पालन से छूट दे दी जाती है तो शेष संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं को भी संविदा पालन से छूट मिल जाती है ।

धारा 45. संयुक्त अधिकारों का न्यागमन – इस धारानुसार जब कोई व्यक्ति एक से अधिक व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से प्रतिज्ञा करता है तो जब तक कि संविदा से इससे प्रतिकूल आशय प्राप्त न होता हो, उन सभी को प्रतिज्ञा के पालन की मांग करने का संयुक्त अधिकार होता है और यदि उन प्रतिज्ञाकर्ताओं में से किसी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके प्रतिनिधियों को जीवित प्रतिग्रहीताओं के साथ यह अधिकार प्राप्त हो जाता है और अंतिम प्रतिज्ञाग्रहीताओं की मृत्यु के बाद यह अधिकार सभी मृतक प्रतिज्ञाग्रहीताओं के प्रतिनिधियों को मिल जाता है ।

दृष्टांत – ‘A’ अपने को ‘B’ और ‘C’ द्वारा उधार दिए गये 5000 रूपये के प्रतिफल में संयुक्ततः ‘B’ और ‘C’ को वह राशि ब्याज समेत विनिर्दिष्ट दिन प्रतिसंदत्त करने का वचन देता है । ‘B’, मर जाता है । पालन का दावा करने का अधिकार ‘C’ के जीवन के दौरान में ‘B’ के प्रतिनिधियों को ‘C’ के संयुक्ततः और ‘C’ की मृत्यु के पश्चात ‘B’ और ‘C’ के प्रतिनिधियों को संयुक्ततः होता है ।

पालन के लिए समय और स्थान (धारा 46 से 50) –

धारा 46. वचन पालन के लिए समय, जहां कि  पालन के लिए आवेदन न किया जाना हो और कोई समय विनिर्दिष्ट न हो – यदि संविदा के अनुसार प्रतिज्ञाकर्ता को अपनी प्रतिज्ञा का पालन बिना प्रतिग्रहीता के आवेदन करना है और पालन के लिए कोई समय उल्लेखित नहीं है तो उसे अपनी प्रतिज्ञा का पालन युक्तियुक्त समय के भीतर करना पड़ेगा । यह प्रश्न कि युक्तियुक्त समय क्या है, प्रत्येक विशिष्ट मामले में तथ्य का प्रश्न है ।

धारा  47. वचन पालन के लिए समय और स्थान जहां कि पालन के लिए समय विनिर्दिष्ट हो और आवेदन न किया जाना हो – जब किसी प्रतिज्ञा (वचन) का पालन निश्चित दिन किया जाना है और प्रतिज्ञाकर्ता (वचनदाता) ने प्रतिज्ञाग्रहीता (वचनग्रहीता) द्वारा आवेदन किये जाने के बिना उसके पालन का वचन दिया है तब कारबार के प्रायिक घंटो के दौरान किसी भी समय ऐसे दिन और स्थान पर जिस पर कि उस प्रतिज्ञा का पालन किया जाना चाहिए, प्रतिज्ञाकर्ता उसका पालन कर सकेगा ।

दृष्टांत – ‘A’ वचन देता है कि वह पहली जनवरी को ‘B’ के भाण्डागार में माल परिदत्त करेगा । उस दिन ‘A’ माल को ‘B’ के भाण्डागार में लाता है, किन्तु उसके बंद होने के प्रायिक घंटे के पश्चात् और माल नहीं लिया जाता । ‘A’ ने अपने वचन का पालन नहीं किया ।

धारा 48. अमुक दिन पर पालन के लिए आवेदन उचित समय और स्थान पर किया जाएगा – जब किसी प्रतिज्ञा का पालन निश्चित किया जाता है और प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना उसका पालन करने का प्रतिज्ञाकर्ता ने वचन नहीं दिया है तब उचित स्थान पर और कारबार के प्रायिक घंटो के भीतर पालन करने के लिए आवेदन करना प्रतिज्ञाग्रहीता का कर्तव्य है । उचित समय और स्थान क्या है, यह प्रत्येक विशिष्ट मामले में तथ्य का प्रश्न है ।

धारा 49. वचन के पालन के लिए स्थान, जहां कि पालन के लिए, आवेदन न किया जाना हो और कोई स्थान नियत  न हो– जब किसी प्रतिज्ञा का पालन प्रतिज्ञाग्रहीता (वचनग्रहीता) के आवेदन के बिना किया जाना हो और उसके पालन के लिए कोई स्थान नियत न हो तब प्रतिज्ञाकर्ता  (वचनदाता) का कर्तव्य है कि वह प्रतिज्ञा के पालन के लिए युक्तियुक्त स्थान नियत करने के लिए प्रतिग्रहीता से आवेदन करे और ऐसे स्थान में उसका पालन करे ।

दृष्टांत – ‘A’ 1000  मन पटसन ‘B’ को एक नियत दिन परिदान करने का वचन डेरा है । ‘A’ को ‘B’ से आवेदन करना होगा कि वह उसे लेने के लिए युक्तियुक्त स्थान नियत करे और ‘A’ को ऐसे स्थान पर पटसन परिदत्त करना होगा ।

धारा 50. वचनग्रहीता द्वारा विहित या मंजूर किये गए प्रकार से या उस समय पर पालन – किसी भी वचन का पालन उस प्रकार से और उस समय पर किया जा सकेगा, जिसे वचनग्रहीता विहित या मंजूर करे ।

दृष्टांत – ‘A’ यह चाहता है कि ‘B’, जो उसे 100 रूपये का देनदार है, उसे डाक द्वारा 100 रूपये का नोट भेजे । जैसे ही ‘B’ उस नोट सहित चिट्ठी को, जिस पर ‘A’ का पता सम्यक रूप से लिखा है, डाक में डालता है वैसे ही ऋण का सम्मोचन हो जाता है ।

व्यतिकारी वचनों का पालन (धारा 51 से 54) –

धारा 51. वचनदाता पालन करने के लिए आबद्ध नहीं है तब तक कि व्यतिकारी वचनग्रहीता पालन के लिए तैयार और रजामंद न हो – जब किसी संविदा में एक साथ पालन की जानी वाली प्रतिज्ञायें होते है तो प्रतिज्ञाकर्ता के लिए अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना तब तक आवश्यक नहीं है जब तक प्रतिज्ञाग्रहीता अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए इच्छुक और तैयार न हो ।

दृष्टांत – ‘A’ और ‘B’ संविदा करते है कि ‘B’ को ‘A’ माल परिदत्त करेगा जिसके लिए संदाय माल के परिदान पर ‘B’ द्वारा किया जाएगा ।

माल का परिदान करना ‘A’ के लिए आवश्यक नहीं है जब तक कि ‘B’ परिदान पर माल के लिए संदाय करने को तैयार और रजामंद न हो ।

माल के लिए संदाय करना ‘B’ के लिए आवश्यक नहीं है जब तक कि संदाय पर माल को परिदत्त करने के लिए ‘A’ तैयार और रजामंद न हो ।

धारा 52. व्यतिकारी वचनों के पालन का क्रम – जब वह क्रम जिसमें पारस्परिक प्रतिज्ञाओं का पालन किया जाता है, संविदा द्वारा अभिव्यक्त रूप से नियत है तब उनका पालन उसी क्रम में किया जाना चाहिए परन्तु यदि वह क्रम संविदा द्वारा अभिव्यक्त रूप से नियत नहीं है तो ऐसी स्थिति में उसका पालन उस क्रम से किया जाएगा जो संव्यवहार की प्रकृति द्वारा अपेक्षित है ।   

दृष्टांत – ‘A’ और ‘B’ संविदा करते है कि ‘A’ नियत कीमत पर ‘B’के लिए एक गृह बनाएगा । ‘A’ को गृह बनाने के वचन का पालन ‘B’ द्वारा उसके लिए संदाय के वचन के पालन से पहले करना होगा ।

धारा 53. जिस घटना के घटित होने पर संविदा प्रभावशाली होनी है उसका निवारण करने वाले पक्षकार का दायित्व – यदि किसी संविदा में पारस्परिक प्रतिज्ञायें अंतर्विष्ट है और संविदा में एक पक्षकार दूसरे को उसकी प्रतिज्ञा के पालन से रोकता है तो संविदा इस प्रकार रोके गये पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय होगी और इस प्रकार के अपालन से यदि उसे हानि होती है तो वह उस पक्षकार से जिसने उसे संविदा का पालन करने से रोका है, प्रतिकर प्राप्त कर सकता है ।

धारा 54. व्यतिकारी वचनों से गठित संविदा में, उस वचन के व्यतिक्रम का प्रभाव जिसका पालन पहले किया जाना चाहिए– जब कोई संविदा ऐसी पारस्परिक प्रतिज्ञाओं से गठित है कि उनमे से एक का पालन अथवा उसके पालन का दावा तब तक नहीं किया जा सकता है जब तक कि दूसरी का पालन नहीं कर दिया जाता है और अंतिम वर्णित प्रतिज्ञा का प्रतिज्ञाकर्ता उसका पालन करने में असफल रहता है तो ऐसा प्रतिज्ञाकर्ता पारस्परिक प्रतिज्ञा के पालन का दावा नहीं कर सकता है और संविदा का पालन न किये जाने के कारण दूसरे पक्षकार को होने वाली हानि के लिए वह प्रतिकर देने के लिए दायी होगा ।

दृष्टांत – ‘B’ के पोत  को ‘A’ अपने द्वारा दिए जाने वाले माल को भरने और कलकत्ते से मारीशस तक ले जाने के लिए भाड़े पर लेता है । उसके माल को ले जाने के लिए ही ‘B’ को भाड़ा मिलना है । ‘A’पोत के लिए कोई माल नहीं देता है । ‘B’ के वचन के पालन का दावा ‘A’ नहीं कर सकता और ‘B’ को, उस हानि के लिए, जो ‘B’ ने उस संविदा के अपालन से उठाया है, प्रतिकर देना होगा ।

धारा 55. समय पर संविदा का पालन न करने का परिणाम – धारा 55 समय पर संविदा का पालन न करने के परिणाम के सम्बन्ध में उपबंध करती है ।

उस संविदा में जिसमे समय मर्मभूत है नियत समय पर पालन न करने का परिणाम – यदि संविदा का पक्षकार किसी बात को उल्लिखित समय पर या उससे पूर्व करने का वचन देता है परन्तु ऐसा करने में असफल रहता है और पक्षकारों का आशय यह रहा है कि समय संविदा का मर्म हो तो संविदा वचनग्रहीता के विकल्प पर शून्यकरणीय होगी ।

ऐसी असफलता का प्रभाव जब समय मर्मभूत नहीं है – यदि पक्षकारों का आशय यह नहीं है कि समय संविदा का मर्म हो तो ऐसी स्थिति में उल्लिखित समय पर या उससे पूर्व संविदा पालन की असफलता के कारण संविदा शून्यकरणीय नहीं होती है परन्तु वचनग्रहीता ऐसी असफलता से हुई हानि के लिए वचनदाता से प्रतिकर प्राप्त कर सकता है ।

करारित समय से भिन्न समय पर किये गए पालन के प्रतिग्रहण का प्रभाव – यदि समय संविदा का मर्म है और उल्लिखित समय या उससे पूर्व संविदा का पालन न करने के कारण संविदा वचनग्रहीता के विकल्प पर शून्यकरणीय हो जाती है तो भी वचनग्रहीता संविदा को शून्य न करके वचन का पालन स्वीकार कर सकता है, परन्तु ऐसी स्थति में नियत समय पर संविदा पालन न किये जाने के कारण हुई हानि के लिए वह प्रतिकर का दावा तब तक नहीं कर सकता जब तक कि वचन का पालन समय के पश्चात् स्वीकार करते समय उसने प्रतिकर का दावा करने के आशय की सूचना वचनदाता को न दी हो ।

अवडेल टूल्स एंड सर्विसेज बनाम मे० ट्रूफिट फास्नर्स प्रा. लि., 2009 के वाद में यह कहा गया कि समय संविदा का मर्म है अथवा नहीं यह पक्षकारों के आशय पर निर्भर करता है । पक्षकारों का आशय करार की भाषा, पक्षकारों का आचरण तथा मामले की परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित किया जाता है ।

भूमि व अचल संपत्ति के विक्रय की संविदा में साधारणतः समय को संविदा का मर्म नहीं माना जाता लेकिन यदि संविदा में अभिव्यक्त रूप से उल्लिखित है कि समय संविदा का मर्म है, तो माना जाएगा ।

व्यापारिक संविदाओं में समय को सामान्यतः संविदा का मर्म माना जाता है ऐसा इसलिए कि व्यापार में निश्चितता की सर्वाधिक आवश्यकता होती है । जिस माल के मूल्य में प्रतिदिन परिवर्तन होता रहता है ऐसे माल की क्रय-विक्रय की संविदा में माल के परिदान का समय तथा मूल्य के भुगतान का समय संविदा का मर्म माना जाता है ।  

धारा 57. वैध बातों, और ऐसी अन्य बातों को भी, जो अवैध हो, करने का व्यतिकारी वचन – यह धारा ऐसी संविदाओं से सम्बंधित है जिनमें अनेको प्रकार की प्रतिज्ञाये होती है जिनमें कुछ वैध तथा कुछ अवैध बातों के लिए होती है । इन प्रतिज्ञाओं के लिए अलग-अलग प्रतिफल होता है । इन प्रतिज्ञाओं में से जो प्रतिज्ञायें अवैध होती हैं, वे तो शून्य हो जायेंगी परन्तु जो  वैध होती हैं उनके पालन के लिए पक्षकार बाध्य होते है । इस प्रकार यह धारा स्पष्ट कर देती है कि अवैध प्रतिज्ञाओं का संवर्ग वैध प्रतिज्ञाओं को प्रभावित नहीं करेगा ।

दृष्टांत – ‘A’ और ‘B’ करार करते है कि ‘B’ को एक घर ‘A’10,000 रूपये में बेचेगा, किन्तु यदि ‘B’ उसे एक जुआ घर के लिए उपयोग में लायेगा तो वह ‘A’ को 50,000 रूपये देगा ।

व्यतिकारी वचनों का, अर्थात गृह को बेचने का और उसके लिए 10,000 रूपये देने का प्रथम वचन-संवर्ग एक संविदा है ।

द्वितीय संवर्ग एक विधि विरुद्ध उद्देश्य के लिए है, अर्थात इस उद्देश्य के लिए है कि ‘B’ उस गृह को जुआ घर के रूप में उपयोग में लाये, और वह शून्य करार दे ।

धारा 58. अनुकल्पी वचन जिसकी एक शाखा अवैध हो – यदि प्रतिज्ञाकर्ता को दो कार्यो में से किसी एक कार्य को करने का विकल्प प्राप्त है और उन दो कार्यो में से एक अवैध है तो जो कार्य अवैध है उसको करने की प्रतिज्ञा शून्य होगी परन्तु जो कार्य वैध है उसको करने की प्रतिज्ञा प्रवर्तनीय होगी ।

दृष्टांत – ‘A’ और ‘B’ करार करते हैं कि ‘B’ को ‘A’ 1000 रुपया देगा जिसके लिए ‘A’ को ‘B’ तत्पश्चात या तो चावल या तस्करित अफीम परिदत्त करेगा ।

यहाँ चावल परिदत्त करने का करार विधि मान्य संविदा है जबकि अफीम के बारे में शून्य करार है ।

संदायो का विनियोग (धारा 59 से 61) –

धारा 59. जहां कि वह ऋण उपदर्शित हो, जिसका उन्मोचन किया जाना है, वहां संदायों का उपयोजन –  यह धारा क्लेटन के वाद पर आधारित है । यह उन मामलों से सम्बंधित है जबकि कोई ऋणी एक ही ऋणदाता से कई ऋण ले रखा है ऐसी स्थिति में यदि ऋणी ऋणदाता को कोई भुगतान करता है और ऋणदाता को सूचना दे देता है कि उक्त भुगतान किसी विशिष्ट ऋण के उन्मोचन के लिए है और ऋणदाता वह स्वीकार कर लेता है तो ऋणदाता उस भुगतान को ऋणी के निर्देशानुसार प्रयोग करने के लिए बाध्य होगा ।

दृष्टांत – अन्य ऋणों के साथ-साथ ‘B’ को ‘A’ 567 रूपये का देनदार है, ‘A’ से ‘B’ इस राशि के संदाय का लिखित मांग करता है । ‘B’ को ‘A’ 567 रूपये भेजता है । यह संदाय उस ऋण के उन्मोचन के लिए उपयोजित किया जाना है जिनके संदाय की मांग ‘B’ ने की थी ।

धारा 60. जहां कि वह ऋण उपदर्शित न हो जिसका उन्मोचन किया जाना है, वहां संदाय का उपयोजन – जबकि ऋणी कोई भुगतान करता है परन्तु वह ऋणदाता को यह सुचना नहीं देता है तथा परिस्थितियों से भी संकेत नहीं मिलता है कि कई ऋणों में से किस ऋण की अदायगी में उसका प्रयोग किया जाएगा तो ऐसी स्थिति में ऋणदाता उसका प्रयोग किसी विधिपूर्ण ऋण, जो ऋणी द्वारा ऋणदाता को देय हो की अदायगी में कर सकता है चाहे तो वह उसका प्रयोग कालतिरोहित ऋण के रूप में भी कर सकता है ।

धारा 61. जहां कि दोनों पक्षकारों में से कोई भी विनियोग नहीं करता है वहां संदाय का उपयोजन – जब ऋणी भुगतान करता है पर सूचना नहीं देता है कि उसका प्रयोग किस ऋण की अदायगी के लिए किया जाएगा और ऋणदाता भी उसका विनियोग किसी ऋण की अदायगी में नहीं करता है तो धारा 61 लागू होगी और विधि इसके विनियोग का प्रावधान करेगी ।

शून्यकरणीय संविदा के विखंडन पर फायदा का प्रत्याख्यान (धारा 64) – यह धारा शून्यकरणीय संविदा के विखंडन के परिणाम को बताती है । इस धारानुसार यदि कोई व्यक्ति जिसके विकल्प पर संविदा शून्यकरणीय है, संविदा को विखंडित करता है तो दूसरे पक्षकार के लिए संविदा के अपने भाग का पालन करना आवश्यक नहीं है । अगर ऐसी संविदा में व्यक्ति लाभ प्राप्त करता है तो उसे वापस करना होगा । यह धारा, धारा 19, 19-क, 39, 53, 55 के अंतर्गत  लागू होती है परन्तु यह धारा अवयस्क या संविदा करने में अन्य अक्षम व्यक्ति द्वारा की गयी संविदा के सम्बन्ध में लागू नहीं होती ऐसा मोहरी बीबी बनाम धर्मोदास घोष में कहा गया है ।

शून्य करार व शून्य हो गयी संविदा के अधीन प्राप्त फायदा का प्रत्यास्थापन (धारा 65) – यह धारा यह उपबंधित करती है कि जब करार शून्य पाया जाता है तो ऐसे में पक्षकार जो लाभ प्राप्त करते है उसे वापस करना होगा या प्रतिकर देना होगा । करार करते समय यदि पक्षकारो को यह पता है कि करार शून्य है तो यह लागू नहीं होगी । यह उस समय भी लागू है जब करार अवैध होने के कारण शून्य हो परन्तु पक्षकारों को इसके अवैध होने का पता न हो ।

धारा 65 का दूसरा भाग ऐसी स्थिति का उल्लेख करता है जबकि संविदा निर्माण के समय तो प्रवर्तनीय है परन्तु बाद की घटनाओं के कारण शून्य हो जाती है । यह धारा उस समय भी लागू होती है जबकि संविदा बाद में पालन की असम्भवता के कारण धारा 56 के पैरा 2 में शून्य हो जाती है । संविदा के शून्य होने से पूर्व जिस पक्षकार ने लाभ प्राप्त किया है वह उसे वापस करेगा या प्रतिकर देगा ।

शून्यकरणीय संविदा के विखंडन की संसूचना या प्रतिसंहरण की रीति (धारा 66) – यह धारा यह स्पष्ट कर देती है कि शूयकरणीय संविदा का विखंडन उसी ढंग से होना चाहिए जो नियमों के अंतर्गत संसूचित किया जाएगा ।

पालन के लिए युक्तियुक्त सुविधा वचनदाता को देने में वचनग्रहीता के उपेक्षा का प्रभाव (धारा 67) – यदि प्रतिज्ञाकर्ता प्रतिज्ञाग्रहीता को अपने वचन का पालन करने के लिए युक्तियुक्त सुविधा देने से इन्कार करता है या देने में उपेक्षा करता है तो अपालन के उत्तरदायित्व से प्रतिज्ञाकर्ता को माफ़ी हो जायेगी अर्थात ऐसे अपालन के उत्तरदायित्व से प्रतिज्ञाकर्ता को छुटकारा मिल जाएगा ।

B. संविदा भंग द्वारा उन्मोचन – जब संविदा का एक पक्षकार संविदा का पालन नही करता जबकि विधि के अंतर्गत वह उसका पालन करने के लिए बाध्य है तो दूसरा पक्षकार भी संविदा के पालन के दायित्व से मुक्त हो जाता है और वह संविदा भंग के कारण होने वाली हानि के लिए प्रतिकर वसूल कर सकता है ।

संविदा भंग के प्रकार –

1. पालन के समय संविदा भंग – जब संविदा का पक्षकार संविदा का नियत समय पर पालन न करके भंग करता है तो वह वास्तविक संविदा भंग कहलाता है ।

2. समय पूर्व संविदा भंग – जब संविदा का पक्षकार संविदा के लिए नियत समय के पूर्व ही संविदा का पूर्णरुपेण पालन करने से इंकार कर देता है या पालन करने से खुद को निर्योग्य बना लेता है या हो जाता है तो वह समय पूर्व संविदा भंग माना जाता है ।

फ्रास्ट बनाम राईट के वाद में प्रतिवादी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद वादी से विवाह करने का करार किया था मगर वह अपने पिता की मृत्यु से पूर्व ही वादी से विवाह करने से इंकार कर दिया था वादी क्षतिपूर्ति की अधिकारी थी । यहाँ यह जरुरी नही है कि प्रतिवादी के पिता की मृत्यु के बाद ही वह वाद लाये ।

C. पालन की असम्भवता की स्थिति में उन्मोचन – धारा 56के प्रथम खण्ड के अनुसार यदि कोई करार जो स्वतः किसी असंभव कार्य को करने के लिए हुआ हो प्रारम्भतः शून्य है ।

धारा का दूसरा खण्ड यह बताता है कि यदि संविदा करते समय वह कार्य तो संभव था मगर बाद में असंभव हो जाता है तो भी संविदा शून्य हो जायेगी ।

वही तीसरे खण्ड के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे बात को करने का वचन देता है जिसका असंभव या विधिविरुद्ध होना वह जानता था और वचनग्रहीता नही जानता था तो ऐसी स्थिति में वचनग्रहीता को उक्त वचन से होने वाली हानि के लिए वचनदाता उत्तरदायी है ।    

नैराश्य का सिद्धांत (पश्चातवर्ती असम्भव्यता का सिद्धांत) – धारा 56 के दूसरे पैराग्राफ में पश्चातवर्ती असम्भव्यता (नैराश्य का सिद्धांत) के बारे में उपबंध किया गया है । कभी-कभी ऐसा होता है कि संविदा करते समय तो संविदा का पालन संभव होता है परन्तु बाद की कुछ घटनाओं के कारण पालन असंभव या अवैध हो जाता है । दोनों परिस्थितियों में संविदा शून्य हो जाती है । जैसे – विवाह की संविदा करने के बाद एक पक्षकार पागल हो जाये या माल को आयात करने की संविदा करने के बाद सरकार द्वारा आयात वर्जित कर दिया जाये या गाने की संविदा करने के बाद यदि निश्चित समय पर वह अस्वस्थ हो जाये तो इन सभी परिस्थितियों में संविदा शून्य हो जायेगी ।

असंभव्यता का आधार – पैराडाइज बनाम जेन, 1647 के मामले में सर्वप्रथम इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया था जिसमें यह कहा गया था कि संविदा हो जाने के बाद घटित होने वाली घटनाओं का संविदा पर कोई प्रभाव नही पड़ना चाहिए । इस वाद में प्रतिवादी ने वादी से एक जमीन पट्टे पर ली थी । विदेशी शत्रुओं ने कुछ समय के लिए इस जमीन को अपने कब्जे में कर लिया था अतः प्रतिवादी ने इस समय का किराया देने से इंकार कर दिया परन्तु न्यायालय के द्वारा उसे किराया देने के लिए बाध्य किया गया । न्यायालय ने अपने मत को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब एक पक्षकार अपनी संविदा द्वारा कोई कर्तव्य या आभार ग्रहण करता है तो उसको वह कर्तव्य पूरा करना ही चाहिए भले ही उसका पालन किसी दुर्घटना के कारण कितना ही कष्टप्रद क्यों न हो ।

परन्तु पश्चातवर्ती वाद टेलर बनाम कार्डवेल, 1886 के मामले में प्रतिवादी ने वादी को अपना संगीत गृह एक संगीत समारोह मनाने के लिए कुछ दिन तक किराए पर देने का वचन दिया था परन्तु समारोह के प्रारम्भ होने के पूर्व ही संगीत गृह में आग लग जाने के कारण संगीत गृह नष्ट हो गया । वादी के द्वारा प्रतिवादी के विरुद्ध संविदा भंग के लिए वाद लाया । न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह संविदा अप्रतिबंधित नही थी, इसका पालन संगीत गृह के मौजूद रहने पर ही निर्भर करता था अर्थात संविदा का पालन भौतिक रुप से असंभव हो गया था और ऐसी स्थिति में पालन किया जाना संभव नही था और संविदा शून्य हो गया था ।

केल बनाम हेनरी, 1903 के मामले में प्रतिवादी ने वादी का मकान 26 व 27 जून को राज्याभिषेक का जुलुस देखने के लिए किराए पर लिया । वह जुलुस उस मकान के साथ वाली सड़क पर से होकर गुजरने वाला था । कुछ किराया प्रतिवादी ने अग्रिम दे दिया था । जुलुस राजा के बीमार हो जाने के कारण स्थगित कर दिया गया और प्रतिवादी ने बाकी किराया देने से इंकार कर दिया । वादी ने बाकी किराया प्राप्त करने के लिए वाद लाया । न्यायालय ने निर्णय दिया कि उस मकान को दो दिन के लिए लेने का उद्देश्य दोनों ही पक्षकार के अनुसार राज्याभिषेक का जुलुस देखना था अतः यह संविदा का आधार था । संविदा का यह उद्देश्य जुलुस न निकलने के कारण व्यर्थ हो गया था । ऐसी स्थिति में वादी शेष किराया प्राप्त नही कर सकता था ।

भारत में सत्यव्रत घोष बनाम मंगनीराम, 1954 के वाद में असंभव्यता के सिद्धांत को लागू किया गया । इस वाद में प्रतिवादी कंपनी ने एक भूखंड खरीदकर तथा उसका विकास करके मकान बनवाने की योजना बनायी । वादी ने प्रतिवादी से एक प्लाट खरीदने की संविदा की तथा उसके लिए अग्रिम धनराशि भी दे दिया । वहां पर सड़के तथा नालियां बनवानी थीं तथा कई ऐसे अनेक कार्य करवाने थे जिनसे वह क्षेत्र मकान बनाने योग्य तथा निवास योग्य हो जाता । इन कार्यों के पूरा हो जाने पर प्लाट के विक्रेता द्वारा क्रेता से बाकी रकम लेकर प्लाट उसे दे दिया जाना था परन्तु इन कार्यो में अभी कुछ भी नही हो पाया था कि उस क्षेत्र का अधिकाँश भाग सरकार द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध में सैनिक उद्देश्य के लिए ले लिया गया । प्रतिवादी कंपनी ने इस आधार पर कि मध्यवर्ती घटना के कारण संविदा का पालन असंभव हो गया था प्लाट देने की संविदा को समाप्त करना चाहा परन्तु न्यायालय ने यह कहा कि संविदा व्यर्थ नही हुई थी । निःसंदेह प्लाट बनाने की कार्यवाही में विलंभ आ गया था परन्तु क्या यह विलंभ ऐसा था जिससे पक्षकारों का व्यापारिक उद्देश्य और संविदा की प्रकृति बिलकुल उलट गयी थी ? इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि सरकारी आदेश अस्थायी या स्थायी था ।

यदि निर्माण कार्य पूरा करने के लिए कोई निश्चित अवधि हुई होती तो यह बड़ी आसानी से कहा जा सकता था कि हस्तक्षेप द्वारा असीमित समय के विलंभ के कारण कार्य निश्चित अवधि के भीतर पूरा नही किया जा सकता है, जिसके कारण पक्षकारों का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा परन्तु जिस संविदा में कोई समय की सीमा न हो और पक्षकारो के बीच कोई इस तरह का अनुबंध भी न हो तो युद्ध आरम्भ होने पर पक्षकार यह समझ सकते हैं कि कोई न कोई प्रतिबन्ध उसके कार्यों पर लग सकता है । इन बातों को ध्यान में रखते हुए हम नही कह सकते हैं कि सरकारी आदेश जो इस मामले में लागू हुआ था संविदा का निरादर कर देगा ।

सिद्धांत के लागू होने के प्रमुख कारण –

1. संविदा के पक्षकारों की मृत्यु या अक्षमता – जब संविदा प्रतिज्ञाकर्ता के व्यक्तिगत कौशल पर आधारित होती है तो यदि प्रतिज्ञाकर्ता की मृत्यु हो जाती है या वह अक्षम हो जाता है तो संविदा का उन्मोचन हो जाता है और उसे संविदा के पालन से मुक्ति मिल जाती है ।

2. संविदा की विषय-वस्तु की बर्बादी या विनाश – जब संविदा की विषय-वस्तु नष्ट हो जाती है तो उसका पालन करना असंभव हो जाता है तो पक्षकार कर्तव्य मुक्त हो जाते हैं ।

3. किसी विशेष घटना का घटित न होना – यदि संविदा किसी विशेष घटना के घटने पर आधारित है और वह घटना नही घटती है तथा संविदा के उदेश्य में परिवर्तन हो जाता है तो पक्षकार संविदा के पालन करने से मुक्त हो जाते हैं ।

4. सरकार अथवा वैधानिक हस्तक्षेप के होने से ।

5. युद्ध का हस्तक्षेप ।

असंभव्यता के परिणाम एवं सीमाए – जब भी संविदा का पालन असंभव हो जाता है, संविदा स्वयं विघटित हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप संविदा के पक्षकार अपने दायित्व से उन्मुक्त हो जाते हैं ।

असंभव्यता के सिद्धांत की निम्नलिखित सीमाएं हैं –

1. व्यर्थता किसी पक्षकार द्वारा प्रेरित नही होना चाहिए ।

2. व्यर्थता स्वमेव कार्यशील होती है ।

3. अधिकारों का समायोजन और प्रत्यास्थापन होने पर ।

D. संविदा के नवीयन द्वारा उन्मोचन (धारा 62 & 63) –

नवीयन जब पक्षकार विद्यमान संविदा को एक नई संविदा के द्वारा प्रतिस्थापित करने का करार करते हैं, उसे नवीयन कहते हैं ।

स्कार्फ बनाम जोआर्डन, 1882 के मामले में लार्ड सेलबर्न ने नवीयन को स्पष्ट करते हुए यह कहा है कि नवीयन के अंतर्गत विद्यमान संविदा को एक नई संविदा के द्वारा, चाहे वह उन्ही पक्षकारों में हो या भिन्न पक्षकारों में, इस प्रतिफल के बदले में प्रतिस्थापित किया जाता है कि मूल संविदा समाप्त हो जायेगी । ऐसी स्थिति में सामान्य उदाहरण भागीदारी विधि के अंतर्गत मिलते हैं जैसे फर्म के विघटन पर या उसके एक भागीदार के अलग होने पर जो व्यक्ति उस कारबार को आगे चलाना चाहते हैं वे अक्सर निवृत भागीदार से यह समझौता कर लेते हैं कि वे कारबार सम्बन्धी समस्त ऋण स्वयं अपना लेंगे और उनका भुगतान करेंगे । ऐसी स्थिति में वे इस बात की सूचना लेनदार को देते हैं और लेनदार इसे मान लेता है तो उसके साथ नई फर्म का करार हो जाता है और निवृत भागीदार अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है ।

सामान्यतया नवीयन दो प्रकार के होते हैं –

1. पक्षकारों का परिवर्तन

2. नई संविदा की प्रतिस्थापना

1. पक्षकारों का परिवर्तन – संविदा अधिनियम की धारा 62 में दिया गया प्रथम दृष्टांत पक्षकारों के परिवर्तन द्वारा नवीयन की स्थिति को स्पष्ट करता है । जैसे यदि ‘A’ ऋणी है और लेनदार उसके स्थान पर ‘B’ को अपना ऋणी मानना स्वीकार कर लेता है तो लेनदार और ‘A’ की मूल संविदा समाप्त हो जाती है ।

नवीयन विद्यमान भागीदारी फर्म में नए भागीदार के आने पर या मौजूदा भागीदार के फर्म छोड़ने पर होता है । यदि नई फर्म जो कि भागीदार के आने के बाद या बाहर जाने के बाद अस्तित्व में आती है, पुरानी फर्म के अधिकारों और उत्तरदायित्वों को स्वीकार कर ले और जिन लोगो के साथ फर्म का संव्यवहार है इस नवीयन को स्वीकार कर ले तो पुरानी फर्म की संविदा समाप्त हो जाती है ।

2. नई संविदा की प्रतिस्थापना –  यदि संविदा के पक्षकार पुरानी संविदा को नई संविदा से बदल देते हैं तो उन्हें पुरानी संविदा के पालन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है । इस सिद्धांत को लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि पुरानी संविदा वैध, विद्यमान और भंग नही होनी चाहिए । भंग होने के बाद उसके स्थान पर नई संविदा को प्रतिस्थापित नही किया जा सकता है ।

मनोहर कोयल बनाम ठाकुरदास, 1888 के मामले में वादी प्रतिवादी के विरुद्ध एक प्रोनोट (वचनपत्र) के अंतर्गत 1173 रूपये वसूल करने के लिए वाद लाया प्रोनोट की देय तिथि निकल जाने के बाद वादी ने प्रतिवादी से 400 रूपये नगद तथा 700 रूपये का वचनपत्र लेना स्वीकार कर लिया परन्तु प्रतिवादी ने न तो नकद धनराशि ही दी और न ही वचनपत्र । अतः वादी ने पुराने वचनपत्र के आधार पर वाद लाया । न्यायालय ने निर्णय दिया कि पुराने वचनपत्र का भुगतान समय पर न होने के कारण वह भंग हो गया था  । भंग होने के बाद जो नया करार हुआ था उससे पुराना करार समाप्त नही हुआ था । इसलिए पुरानी संविदा के भंग हो जाने पर वाद लाया जा सकता था ।

संविदा के नवीयन, विखंडन और परिवर्तन का प्रभाव (धारा 63) –

वह व्यक्ति जिसे संविदा के पालन की मांग करने का अधिकार होता है यदि चाहे तो –

1. पालन से पूर्ण या अपूर्ण छुट दे दे,

2. पालन के समय को विस्तारित कर दे, या

3. पालन के बदले में अन्य कोई वस्तु स्वीकार कर ले ।