धारा 31. “समाश्रित संविदा” की परिभाषा –  यह धारा समाश्रित संविदा को परिभाषित करता है जिसके अनुसार समाश्रित संविदा वह संविदा है जो ऐसी संविदा के साम्पार्श्विक किसी घटनाओं के होने या न होने पर किसी बात को करने या न करने के लिए हो ।

दृष्टान्त – ‘A’, ‘B’ से संविदा करता है कि यदि ‘B’ का घर जल जाये तो वह ‘B’ को दस हजार रुपया देगा, यह समाश्रित संविदा है ।

यदि प्रतिज्ञा का पालन प्रतिज्ञाकर्ता की इच्छा पर निर्भर है तो यह समाश्रित संविदा नहीं है । परन्तु यदि प्रतिज्ञाकर्ता प्रतिज्ञा करता है कि वह एक तृतीय व्यक्ति द्वारा निर्धारित रकम देगा, ऐसी स्थिति में संविदा विधिमान्य है ।   

धारा 32. ऐसी संविदाओं का प्रवर्तन जो किसी घटना के घटित होने पर समाश्रित हो – यह धारा ऐसी समाश्रित संविदा के पालन से सम्बंधित नियम का उल्लेख करता है जो अनिश्चित भावी घटना के घटित होने पर किसी कार्य को करने अथवा न करने के लिए की गई है । धारा 32 यह स्पष्ट कर देती है कि ऐसी समाश्रित संविदा का विधि द्वारा प्रवर्तन तब तक नहीं कराया जा सकता जब तक कि वह घटना घटित न हो जाये ।

यदि वह घटना असंभव हो जाये तो ऐसी संविदाएं शून्य हो जाती है ।

दृष्टान्त – ‘B’ से ‘A’ संविदा करता है कि यदि ‘C’ के मरने के पश्चात् ‘A’ जीवित रहा तो वह ‘B’ का घोड़ा खरीद लेगा । इस संविदा का प्रवर्तन विधि द्वारा नही कराया जा सकता यदि और जब तक ‘A’ के जीवन काल में ‘C’ मर न जाये ।

इसी प्रकार से जहाँ ‘A’ यह संविदा करता है कि जब ‘C’ से ‘B’विवाह कर लेगा तो ‘B’ को ‘A’ एक नियत धनराशी देगा । ‘B’ से विवाह हुये बिना ‘C’ मर जाती है । संविदा शून्य हो जाती है ।

धारा 33. उन संविदाओं का प्रवर्तन जो किसी घटना के घटित न होने पर प्रवर्तित हो – यह धारा उन संविदा के पालन का उपबंध करती है जिसका किसी अनिश्चित भावी घटना के न होने पर निर्भर है । ऐसी संविदाओं का प्रवर्तन तब कराया जा सकता है जब उस घटना का घटित हो जाना असंभव हो जाये उससे पहले उसे प्रवर्तित नही कराया जा सकता है ।

दृष्टांत – ‘A’ करार करता है कि यदि अमुक पोत वापस न आये तो वह ‘B’ को एक धनराशी देगा । वह पोत डूब जाता है । संविदा का प्रवर्तन पोत के डूब जाने के कारण कराया जा सकता है ।

धारा 34. जिस घटना पर संविदा समाश्रित है, यदि वह किसी जीवित व्यक्ति का भावी आचरण हो तो वह घटना कब असंभव समझी जायेगी – यह धारा यह स्पष्ट करती है कि जिस घटना पर संविदा निर्भर है यदि वह किसी जीवित व्यक्ति का भावी आचरण है तो वह घटना कब असंभव मानी जायेगी । इस धारा के अनुसार यदि कोई भावी घटना जिस पर कोई संविदा निर्भर है, अनुरीति है, जिसके अनुसार कोई व्यक्ति किसी निश्चित समय के भीतर कोई कार्य करेगा, तो वह घटना उस समय असंभव हुई समझी जायेगी जबकि ऐसा व्यक्ति कोई ऐसी बात करता है जिससे किसी निश्चित समय के भीतर या उत्तर भावी आकस्मिकताओं के बिना उसके द्वारा वैसा किया जाना असंभव हो जाता ।

दृष्टान्त – ‘A’ करार करता है कि यदि ‘C’ से ‘B’ विवाह करे तो वह ‘B’ को एक धनराशि देगा । ‘D’ से ‘C’ विवाह कर लेती है । अब ‘C’से ‘B’ का विवाह असंभव समझा जाना चाहिए यद्यपि यह संभव है कि ‘D’ की मृत्यु हो जाये और तत्पश्चात ‘B’ से ‘C’ विवाह कर ले ।

धारा 35. संविदाएँ जो नियत समय के भीतर विनिर्दिष्ट घटना के घटित होने पर समाश्रित हो, कब शून्य हो जाती है –

इस धारा के अनुसार किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के किसी नियत समय के भीतर होने पर किसी बात को करने या न करने की (समाश्रित) संविदायें, यदि नियत समय के समाप्ति पर ऐसी घटना नहीं होती है अथवा यदि नियत समय से पूर्व ऐसी घटना असंभव हो जाती है, शून्य हो जाती है ।

विनिर्दिष्ट घटना के नियत समय से भीतर घटित न होने पर समाश्रित संविदाओं का प्रवर्तन कब कराया जा सकेगा –

समाश्रित संविदायें जो किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के किसी नियत समय के भीतर घटित न होने पर किसी बात को करने या न करने के लिए हो, विधि द्वारा तब प्रवर्तित कराई जा सकेगी जब उस नियत समय का अवसान हो गया हो और ऐसी घटना घटित न हुई हो या उस नियत समय के अवसान से पूर्व यह निश्चित हो जाये कि ऐसी घटना घटित नहीं होंगी ।    

दृष्टान्त – ‘A’ वचन देता है कि यदि अमुक पोत एक वर्ष के भीतर न लौटे तो वह ‘B’ को एक धनराशि देगा । यदि पोत उस वर्ष के भीतर न लौटे या उस वर्ष के भीतर जल जाये तो संविदा का प्रवर्तन कराया जा सकेगा ।

धारा 36. असम्भव घटनाओं पर समाश्रित करार शून्य है – इस धारा के अनुसार किसी असंभव घटना के होने पर किसी बात हो करने या न करने के समाश्रित करार शून्य होते है चाहे उक्त करार करते समय घटना की असंभवता की जानकारी करार के पक्षकारो को रही हो अथवा न रही हो ।

उदाहरण – ‘A’ करार करता है कि यदि ‘B’, ‘A’ की पुत्री ‘C’ से विवाह कर ले तो वह ‘B’ को 1000 रूपये देगा । करार के समय ‘C’ मर चुकी है, करार शून्य है ।

बाजी करार व समाश्रित संविदा में अन्तर –

बाजी करार –

1. बाजी करार में किसी अनिश्चित घटना के संदर्भ में करार के दोनों पक्षकारो का विपरीत मत होना चाहिए ।

2. करार के प्रत्येक पक्षकार को जीतने या हारने की संभावना होनी चाहिए ।

3. पक्षकारों में से किसी का भी उस घटना के होने अथवा न होने से जीतने या हारने वाले धन या वस्तु के अतिरिक्त कोई अन्य हित या स्वार्थ नहीं होना चाहिए ।

समाश्रित संविदा –

समाश्रित संविदा से तात्पर्य ऐसी संविदा से है जो ऐसी संविदा में साम्पार्श्विक किसी घटना के घटित होने या न होने पर ही किसी बात को करने अथवा न करने के लिए है ।

उदाहरण – यदि ‘A’ और ‘B’ संविदा करते हैं कि अगले दिन वर्षा होने पर ‘A’ अपनी कार एक लाख रूपये में ‘B’ को बेचेगा, यह समाश्रित संविदा है परन्तु ‘A’ और ‘B’ करार करते है कि अगले दिन वर्षा न होने पर ‘A’, ‘B’ को 5000 रूपये देगा यह बाजी करार है ।