जो करार विधि द्वारा प्रवर्तनीय नही होता है उसे शून्य करार कहते हैं । करार धारा 20 के अंतर्गत पक्षकारो के तथ्य सम्बन्धी भूल के होने पर भी शून्य होता है । धारा 23 के अंतर्गत प्रतिफल या उद्देश्य के विधिविरुद्ध होने पर भी करार शून्य होता है वही धारा 56 के अंतर्गत असंभव कार्य करने का करार शून्य होता है, इत्यादि शून्य करार के उदाहरण हैं ।

यहाँ हम धारा 25 से 30 के अंतर्गत शून्य करारों के बारे में अध्ययन करेंगे । 

धारा 25. प्रतिफल के बिना करार शून्य है सिवाय जबकि वह लिखित तथा रजिस्ट्रीकृत हो, या कि वह किसी बात के लिए प्रतिकर देने का वचन हो, या परिसीमा विधि द्वारा वारित किसी ऋण का संदाय का वचन हो –

प्रतिफल के बिना किया गया करार शून्य है, सिवाय जबकि वह –

1. कोई करार लिखित है और दस्तावेजो के पंजीकरण के लिए तत्समय प्रवृत्ति विधि के अन्तर्गत पंजीकृत है, एक दूसरे के साथ निकट सम्बन्ध रखने वाली पक्षकारों के मध्य प्राकृतिक प्रेम और स्नेह के कारण किया गया है तो यह बिना प्रतिफल के भी विधिमान्य होगा ।

2. स्वेच्छया से की गयी भूतपूर्व सेवा के लिए प्रतिकर देने का वचन हो ।

दृष्टान्त – ‘B’ की थैली ‘A’ पड़ी पाता है और उसको दे देता है । ‘A’को ‘B’ 50 रूपये देने का वचन देता है, यह संविदा है ।

3. काल-तिरोहित ऋण के भुगतान के लिए की गई प्रतिज्ञा यदि लिखित है और उससे भारित किये जाने वाले व्यक्ति द्वारा अथवा इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत उसके अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित है और यह उस ऋण के अंशतः या पूर्णतः भुगतान के लिए की गई है जिस ऋण का भुगतान ऋणदाता मर्यादा विधि के अभाव में करा लेता है ।

दृष्टांत – ‘B’ को 1000 रूपये ‘A’ द्वारा देय है किन्तु वह ऋण परिसीमा विधि द्वारा वारित है । ‘A’ उस ऋण मध्दे ‘B’ को 500  रूपये देने का लिखित वचन हस्ताक्षरित करता है, यह संविदा है ।

धारा 26. विवाह का अवरोधक करार – “हर ऐसा करार शून्य है जो अप्राप्तवय से भिन्न किसी व्यक्ति के विवाह के अवरोधार्थ है ।”

इस सम्बन्ध में आंग्ल विधि और भारतीय विधि में विभेद है । जहां आंग्ल विधि में यदि वह अवरोध पूर्ण न होकर आंशिक है तो करार शून्य नही होता है परन्तु भारतीय विधि में विवाह का अवरोधक करार शून्य होता है भले ही वह अवरोध आंशिक ही क्यों न हो ।

धारा 27. व्यापार का अवरोधक करार शून्य है – प्रत्येक करार जिससे कोई व्यक्ति किसी प्रकार के विधिपूर्ण व्यवसाय या कारोबार करने में अवरुद्ध होता है, अवरोध के विस्तार तक शून्य होगा ।

मधु चन्द्र बनाम राजकुमार के वाद में वादी व प्रतिवादी एक ही मुहल्ले में एक ही तरह का कारोबार करते थें । प्रतिवादी ने वादी से यह करार किया कि यदि वादी अपनी दुकान उस मोहल्ले से हटा दे तो वह कुछ धन देगा । वादी ने मोहल्ले से दूकान हटा दिया तथा उक्त धन की मांग किया परन्तु प्रतिवादी ने धन नही दिया । वादी ने वाद चलाया । न्यायालय ने करार को धारा 27 के अंतर्गत शून्य ठहराया, इस वाद में अवरोध आंशिक था ।

इस प्रकार यदि कोई करार किसी व्यक्ति को विधिपूर्ण पेशा, व्यापार या कारोबार करने से रोकता है तो जिस सीमा तक वह रोकता है उस सीमा तक वह शून्य होगा ।

अपवाद – उपयुक्त सामान्य नियम के कुछ अपवाद भी हैं –

1. यदि कोई व्यक्ति गुडविल बेचने का करार क्रेता से करता है और वह कहता है कि एक निश्चित सीमा के भीतर जिस कारोबार के गुडविल का विक्रय कर रहा है उसका कारोबार वह उस समय तक नही करेगा जब तक कि क्रेता या उसका उत्तराधिकारी उस कारोबार को करता हो तो यह करार विधिमान्य होगा बशर्ते कारोबार की प्रकृति को ध्यान में रखते हुये इस प्रकार की सीमा न्यायालय को युक्तियुक्त प्रतीत होती है ।

2. यदि कोई नौकर या कर्मचारी अपने मालिक या नियोजक से यह करार करता है कि वह एक निश्चित अवधि तक उसकी सेवा में रहेगा और उस अवधि में किसी अन्य व्यक्ति की सेवा नही करेगा तो यह करार विधिमान्य होगा ।

3. कभी-कभी एक समान कारोबार या व्यापार करने वाले व्यापारी अथवा विनिर्माता आपस में करार करते हैं कि वे निश्चित मूल्य से कम पर अपना माल नही बेचेंगे और लाभ को एक सामान्य फण्ड में जमा करेंगे या लाभ को एक निश्चित अनुपात में आपस में विभाजित करेंगे तो यह करार शून्य नही होगा मगर यह एकाधिकार स्थापित करने के लिए किया गया है तो शून्य होगा ।

एकांकी संव्यवहार – यदि कोई विक्रेता या निर्माता किसी क्रेता से करार करता है कि वह अपने द्वारा निर्मित तथा उत्पादित माल केवल उसी क्रेता को बेचेगा तो ऐसे करार को एकांकी संव्यवहार कहते है । यदि ऐसा करार एकाधिकार स्थापित करने के लिए अथवा लम्बी अवधि के अवरोध के लिए किया गया है तो वह शून्य होगा ।

शेख कालू बनाम राम रसन के मामले में पटना शहर में सभी कंघियाँ बनाने वाली कम्पनी के साथ करार किया कि अपने जीवन काल में वे जितनी भी कंघियों का निर्माण करेगी वे सभी कंघियाँ उसको या उसके उत्तराधिकारी को नही बेचेंगी । न्यायालय ने इस करार को शून्य ठहराया क्योंकि इसका उद्देश्य एकाधिकार स्थापित करना था ।

धारा 28. विधिक कार्यवाहियों के अवरोधक करार शून्य हैं –

यह धारा के निम्न प्रकार के करार शून्य घोषित करती है –

1. यदि कोई करार किसी पक्षकार को किसी संविदा के अंतर्गत या संविदा के सम्बन्ध में प्राप्त अधिकारों को साधारण न्यायालय में सामान्य वैध कार्यवाही द्वारा प्रवर्तित करने से रोकता है, वह उस विस्तार तक, जिस विस्तार तक रोकता है, शून्य है ।

2. प्रत्येक करार जो कि किसी विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्त पर उसमे से किसी पक्षकार का संविदा के अधीन या बारे में अधिकार इस प्रकार समाप्त करता है या उसे दायित्व से इस प्रकार उन्मुक्त करता है कि पक्षकार को अपने अधिकार को प्रवर्तित कराने से अवरुद्ध करता है उस विस्तार तक शून्य है ।

अपवाद – इसके निम्न अपवाद हैं –

1. धारा 28 ऐसी संविदा को अवैध नही बनाता जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति करार करते है कि किसी विषय के बारे में जो विवाद उनके बीचे पैदा होगा उसको मध्यस्थ निर्णय के लिए निर्देशित किया जाएगा और इस प्रकार निर्देशित विवाद के बारे में केवल वह रकम वसूल की जा सकेगी जो ऐसे मध्यस्थ निर्धारित करे ।

2. धारा 28 किसी ऐसे लिखित संविदा को अवैध नहीं करती है जिससे दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी प्रश्न को जो कि उनके मध्य पहले ही पैदा हो गया है, मध्यस्थता के लिए निर्देशित करने का करार करते हैं ।

धारा 29. करार अनिश्चितता के कारण शून्य है –

वह करार जिसका अर्थ निश्चित नही है या निश्चित किये जाने योग्य नही है, शून्य है ।

गुथिंग बनाम लिन के वाद में एक घोड़ा इस शर्त पर क्रय किया गया कि यदि घोड़ा किस्मतवाला होगा तो क्रेता पांच पौंड अधिक देगा । यह अनिश्चितता के आधार पर शून्य ठहराया गया । कलकत्ता उच्च न्यायालय ने यह कहा कि भविष्य में करार करने के आधार पर संविदा का निर्माण नही होगा और इसे प्रवर्तित नही कराया जा सकता है ।

‘A’ जो नारियल के तेल का व्यवसायी है, ‘B’ को “एक सौ टन तेल” बेचने का करार करता है । ‘A’ के व्यापार की प्रकृति इस शब्दों का अर्थ उपदर्शित करती है और ‘A’ ने एक सौ टन नारियल के तेल के विक्रय के लिए संविदा की है । परन्तु जहाँ ‘B’ को ‘A’ “एक सौ टन तेल” बेचने का करार करता है । उसमे यह दर्शित करने के लिए कुछ नही है कि किस तरह का तेल आशयित था । करार अनिश्चितता के कारण शून्य है ।

धारा 30. बाजी (पद्यम) का करार शून्य है –

धारा 30 यह स्पष्ट कर देती है कि बाजी लगाने की अनुरीति के करार शुन्य होते है और उसकी रकम वसूलने के लिए वाद नहीं लाया जा सकता । इसके कुछ अपवाद भी है, यह धारा ऐसे चंदे या अंशदान करने के करार को, जो कि घुडदौड़ के विजेता को 500 रूपये या अधिक की कीमत वाली किसी प्लेट, पुरस्कार या धनराशि देने को किया गया है, शून्य घोषित नहीं करती है ।

जैसे – यदि ‘A’, ‘B’ से कहता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच में भारत जीतेगा, पर ‘B’ कहता है कि भारत नहीं जीतेगा दोनों करार करते हैं कि अगर भारत जीतेगा तो ‘B’, ‘A’ को 500 रूपये देगा अगर भारत हारेगा तो ‘A’, ‘B’ को 500 रूपये देगा यह करार बाजी करार है और धारा 30 के अंतर्गत शून्य है ।

आवश्यक तत्व –

1. किसी अनिश्चिय घटना के संदर्भ में पक्षकार का विपरीत मत

2. करार के प्रत्येक पक्षकार को जीतने या हारने की संभावना

3. पक्षकारो का घटना में दाँव या शर्त के अतिरिक्त अन्य कोई हित या स्वार्थ न हो ।     

तेज़ी मंदी संविदा – तेजी मंदी की संविदा से तात्पर्य ऐसी संविदा से है जिसके एक पक्षकार को यह दोहरा विकल्प प्राप्त होता है कि किसी निश्चित तिथि पर कोई निश्चित वस्तु एक निश्चित दर या मूल्य या दर पर खरीदे या बेचे । जिस पक्षकार को यह दोहरा विकल्प प्राप्त होता है वह इसके लिए दूसरे पक्षकार को कुछ प्रीमियम या कमीशन देता है यदि दोनों पक्षकारों का आशय निर्धारित तिथि पर उक्त वस्तु के बाजार मूल्य का अंतर देकर निपटारा करना है तो वह बाजी संविदा होगी ।

बाजी करार का परिणाम – धारा 30 के अनुसार बाजी करार शून्य है और इसलिए न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता ।

बाजी करार से सम्बंधित साम्पार्श्विक करार – धारा 30 के अन्तर्गत बाजी करार शून्य है पर अवैध नही इसलिए बाजी करार से सम्बंधित साम्पार्श्विक  करार प्रवर्तनीय होगा ।

बेनीमाधव दास बनाम कौशल किशोर के वाद में वादी ने प्रतिवादी को कुछ रकम जुयें में हारी गई रकम के भुगतान हेतु उधार दिया । न्यायालय ने निर्णय दिया कि वादी उधार दी गई रकम वसूल करने का हकदार है ।

लाटरी – लाटरी टिकट पर जीती गई इनाम की राशि देने का करार बाजी करार है और यह धारा 30 के अन्तर्गत शून्य है । इसकी यह प्रकृति उस दशा में भी प्रवर्तित नही होगी जबकि लाटरी से सम्बंधित क्रिया-कलापों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र अथवा राज्य द्वारा अधिनियम बनाया गया है । यदि सरकार से अनुमति लेकर कोई लाटरी का आयोजन किया जा रहा है तो वह बाजी करार ही होगा तथा शून्य होगा परिणामस्वरूप लाटरी जीतने वाला इनाम वसूल करने के लिए वाद संस्थित नहीं कर सकता है ।